January 16, 2026

चे ग्वेरा का सच: क्रांति के नाम पर फाँसियाँ, असफल नीतियाँ और तानाशाही

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चे ग्वेरा, जिसे आज भी क्रांति के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है, वास्तव में क्यूबा की तानाशाही, असफल नीतियों और वैचारिक हिंसा का प्रतीक बन चुका है। ला काबाना की फाँसियों से लेकर श्रम शिविरों तक, उसका शासन भय और असहमति के दमन पर टिका था।

केरल के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने चे ग्वेरा की 58वीं पुण्यतिथि पर उन्हें “क्रांति और समानता का प्रतीक” बताते हुए श्रद्धांजलि दी। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर विवाद तेज हो गया है। कई उपयोगकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि क्या ग्वेरा वास्तव में समानता के प्रतीक थे या एक हिंसक तानाशाह, जिन्होंने विरोध को कुचलने के लिए मौत को राजनीतिक औज़ार बनाया।

1959 की तथाकथित कम्युनिस्ट क्यूबा क्रांति के बाद चे ग्वेरा ने हवाना के “ला काबाना” किले की जिम्मेदारी संभाली। यह वही स्थान था जहाँ सैकड़ों कम्युनिस्ट विरोधियों को “क्रांतिकारी न्याय” के नाम पर फाँसी दी गई। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में यह संख्या 100 से 200 के बीच बताई गई है। इन फाँसियों में कई नाबालिग भी शामिल थे।



कई जीवनीकारों का कहना है कि चे ग्वेरा न केवल फाँसी के आदेशों पर हस्ताक्षर करते थे, बल्कि कई बार स्वयं गोली चलाने में भी शामिल होते थे। उस समय न्यायिक प्रक्रिया का कोई औपचारिक ढाँचा नहीं था। “राज्य के दुश्मन” कहे जाने वाले लोगों को पूछताछ के बाद तुरंत गोली मार दी जाती थी।



ग्वेरा के भाषणों और लेखन से भी यह साफ है कि वह इसी तरह की हिंसतमक “क्रांतिकारी न्याय” की अवधारणा में विश्वास करते थे। 1964 में संयुक्त राष्ट्र में दिए गए एक भाषण में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “क्रांति के दुश्मनों के लिए फाँसी न्यायसंगत है।” उनके लिए न्याय का अर्थ था कम्युनिस्ट विचारधारा की रक्षा, भले इसके लिए जानें क्यों न लेनी पड़ें।

1960 में ग्वेरा के आदेश पर पश्चिमी क्यूबा में “गुआनाहाकाबिबेस” श्रम शिविर की स्थापना हुई। शुरू में इसे सरकारी कर्मचारियों के अनुशासन हेतु बनाया गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीतिक विरोधियों, धार्मिक लोगों और समलैंगिकों के लिए सजा का केंद्र बन गया।



इतिहासकारों के अनुसार, यही मॉडल आगे चलकर “यूएमएपी कैंप्स” के रूप में विकसित हुआ, जहाँ 1965 से 1968 के बीच सैकड़ों नागरिकों को बिना मुकदमे के कैद किया गया। अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार आयोग को कई पूर्व कैदियों ने बताया कि इन शिविरों में लोगों को जबरन श्रम करवाया जाता था और किसी भी विरोध को देशद्रोह माना जाता था।

ग्वेरा ने 1961 में उद्योग मंत्री का पद संभाला। उनका उद्देश्य था कि क्यूबा पूंजीवादी चरण को छोड़कर सीधे समाजवादी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़े। उन्होंने “नैतिक प्रोत्साहन” पर आधारित श्रम नीति लागू की, जिसमें मजदूरी से अधिक “आदर्शवाद” को महत्व दिया गया।



परिणाम बेहद खराब रहे। 1962 में क्यूबा को खाद्य वस्तुओं पर राशनिंग लागू करनी पड़ी। औद्योगिक उत्पादन घटा, निर्यात ठप हुआ और अर्थव्यवस्था सोवियत सहायता पर निर्भर हो गई। उनकी नीतियों के चलते सरकारी ढाँचा जटिल होता गया और निजी उत्पादन लगभग समाप्त हो गया।



ग्वेरा ने कम्युनिस्ट क्रांति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की कोशिश की। 1965 में वे अफ्रीका के कांगो पहुँचे जहाँ उन्होंने गुरिल्ला आंदोलन को प्रशिक्षण देने का प्रयास किया। यह मिशन असफल रहा। स्वयं ग्वेरा ने अपनी डायरी में लिखा कि यह उनकी सबसे बड़ी हार थी।

कांगो के बाद उन्होंने लैटिन अमेरिका में विद्रोह भड़काने की योजना बनाई। लेकिन बोलीविया में 1967 में उनका अभियान विफल हुआ और वे सरकारी सेना के हाथों मारे गए। उनके साथियों को या तो गिरफ्तार किया गया या मारा गया।



चे ग्वेरा की मृत्यु के बाद उनकी छवि को वामपंथी समूहों ने “त्याग और विद्रोह” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। 1968 की यूरोपीय छात्र आंदोलनों और बाद में पॉप संस्कृति ने उनके चेहरे को फैशन का हिस्सा बना दिया।



लेकिन इतिहास के दस्तावेज़ बताते हैं कि यह छवि बिलकुल अलग है। उनके दौर में फाँसियों, श्रम शिविरों और आर्थिक विफलता के कई प्रमाण मौजूद हैं। ग्वेरा की तथाकथित क्रांति सामाजिक न्याय से अधिक वैचारिक नियंत्रण की कोशिश थी, जिसने असहमति को अपराध बना दिया।

क्यूबा छोड़ चुके पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्वेरा की नीतियों ने क्यूबा को एक “पुलिस-राज्य” (POLICE STATE) में बदल दिया।



आज भी सोशल मीडिया पर यह बहस जारी है कि क्या चे ग्वेरा को “नायक” कहा जाना चाहिए। इतिहासकारों की राय है कि ग्वेरा का योगदान कम्युनिस्ट क्रांति तक सीमित था, लेकिन उनका शासन और उनकी नीतियाँ मानवाधिकारों की दृष्टि से गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।



चे ग्वेरा के समर्थक उन्हें औपनिवेशिक विरोध का प्रतीक मानते हैं, पर दस्तावेज़ बताते हैं कि उन्होंने विरोध को दबाने के लिए हिंसा का रास्ता चुना। उनकी क्रांति ने न्याय नहीं, भय का शासन स्थापित किया।



आज, जब राजनीतिक मंचों पर और सोशल मीडिया पर उन्हें “प्रेरणा” के रूप में याद किया जा रहा है, तब यह आवश्यक है कि इतिहास को रोमांटिक नहीं, बल्कि यथार्थवादी दृष्टि से देखा जाए। चे ग्वेरा का चेहरा भले टी-शर्ट पर छपा हो, पर उनकी विरासत लोकतंत्र और मानवाधिकारों की कसौटी पर सवालों के घेरे में है।

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