सिरपुर के ऐतिहासिक गंधेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट में वित्तीय घोटाले का सनसनीखेज खुलासा: सरकारी योजनाओं का कथित दुरुपयोग, करोड़ों का नुकसान!
महासमुंद, 25 सितंबर 2025
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के सिरपुर इलाके में स्थित प्राचीन गंधेश्वर महादेव मंदिर से जुड़े ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितताओं का बड़ा मामला सामने आया है। इस धार्मिक स्थल की संपत्तियों से जुड़े कागजातों में गंभीर कमियां पाई गई हैं, जिसके चलते सरकारी सब्सिडी और बोनस योजनाओं का गैरकानूनी फायदा उठाने का आरोप लगा है। इससे राज्य के खजाने को भारी आर्थिक क्षति पहुंची है, और प्रारंभिक जांच में ट्रस्ट की जमीन के रिकॉर्ड में कई विसंगतियां उजागर हुई हैं, जो कानूनी नियमों का खुला उल्लंघन हैं।
लहंगर समिति के प्रमुख पर जमीन हड़पने का गंभीर आरोप
इस घोटाले का केंद्र बिंदु लहंगर समिति के जिम्मेदार तोषण सेन हैं। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, सेन ने मंदिर ट्रस्ट की कीमती खेती की जमीन को कथित तौर पर अपने निजी नाम पर हस्तांतरित करने की कोशिश की। धार्मिक ट्रस्टों की संपत्तियां सिर्फ संस्था के नाम पर ही रजिस्टर हो सकती हैं, लेकिन खड़सा गांव के खसरा नंबर 540/2 में दर्ज 2.20 हेक्टेयर के साथ-साथ कुल 27.79 हेक्टेयर जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव के सबूत मिले हैं। समिति के आंतरिक फाइलें इन अनियमितताओं को साफ तौर पर प्रमाणित करती नजर आ रही हैं।
इसी फर्जी मालिकाना हक के आधार पर सरकारी बोनस स्कीम से लाखों-करोड़ों रुपये का दावा ठोंका गया, जो मंजूर भी हो गया। जानकारों का मानना है कि यह न सिर्फ सरकारी तंत्र की लापरवाही है, बल्कि पवित्र धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा में भी बड़ी चूक का मामला है।
रजिस्ट्रेशन विभाग में साजिश की आशंका: अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
जांच आगे बढ़ने पर पंजीयन विभाग के अफसरों, समिति के निगरानीकर्ताओं और तकनीकी कर्मचारियों की मिलीभगत के संकेत मिले हैं। इतने बड़े पैमाने पर दस्तावेजों में छेड़छाड़ के बावजूद विभाग की तरफ से कोई चेतावनी न जारी होना बेहद शक पैदा कर रहा है। विशेषज्ञों का सवाल है—बिना ऊपरी स्तर के अधिकारियों की जानकारी के यह सब कैसे संभव हुआ? क्या राजनीतिक दबाव या आंतरिक गठजोड़ ने नजरबंदी को ढीला किया? स्थानीय स्रोत बताते हैं कि रजिस्ट्रेशन यूनिट की सुस्ती ने ही इस घपले को पनपने दिया। फिलहाल, जांच टीमें इन सबकी गतिविधियों की गहराई से जांच कर रही हैं।
ट्रस्ट के चेयरमैन और सर्वेक्षक पर भी इल्जाम: आंतरिक भ्रष्टाचार
विवाद तब और गहरा गया जब ट्रस्ट के सर्वेक्षक और अध्यक्ष दाऊलाल चंद्राकर पर भी यही आरोप लगे। दावा किया जा रहा है कि उन्होंने भी ट्रस्ट की जमीन को निजी स्वामित्व में दर्ज कराने में हाथ डाला और प्रतिबंधित सरकारी लाभ का लाभ उठाया। धार्मिक ट्रस्टों को सरकारी इंसेंटिव मिलना वैसे ही वर्जित है, लेकिन इसके बावजूद यह कदम उठाया गया, जिससे राज्य को करोड़ों का चूना लगा। यह घटना ट्रस्ट की आंतरिक व्यवस्था पर भारी सवाल खड़े करती है, जहां जिम्मेदार पदाधिकारी ही कथित रूप से नियम तोड़ने के आरोपी बन बैठे हैं।
श्रद्धालुओं में उबाल: सांस्कृतिक विरासत पर हमला
सिरपुर का गंधेश्वर महादेव मंदिर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है, जहां महानदी के किनारे बसा यह प्राचीन शिव मंदिर हर वर्ष लाखों भक्तों को आकर्षित करता है। शिवलिंग के दर्शन और आध्यात्मिक शांति के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। लेकिन ट्रस्ट की इस कथित साजिश ने भक्तों के बीच गुस्सा भड़का दिया है। स्थानीय निवासी पूछ रहे हैं:
क्या धार्मिक संस्थाओं का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए हो रहा है?
सरकारी कल्याण स्कीमों का दुरुपयोग कैसे अनदेखा रहा?
क्या प्रशासन की चुप्पी किसी बड़े रैकेट की ओर इशारा करती है?
यह महज आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि आस्था की जड़ों पर प्रहार है। सूत्रों का अनुमान है कि गहन जांच से राजनीतिक हस्तियों के नाम भी उभर सकते हैं।
जनाक्रोश: स्वतंत्र जांच की मांग तेज
समाचार फैलते ही सिरपुर और आसपास के गांवों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। भक्त संगठन और ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच समिति बनाने की मांग की है। एक बुजुर्ग निवासी ने कहा, “यह मंदिर हमारी श्रद्धा का केंद्र है। जमीन पर हाथ डालना बर्दाश्त नहीं। अगर दोषियों पर कार्रवाई न हुई तो बड़ा आंदोलन छेड़ेंगे।” लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जिला कलेक्टर के सख्त आदेशों से जांच तेज हो और पारदर्शिता बनी रहे।
क्या प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेगा या यह फाइलों की धूल में दब जाएगा? विश्लेषकों का कहना है कि ऐसी लापरवाही से भविष्य में और मामले सामने आ सकते हैं।
आगे की राह: सख्त निगरानी और डिजिटल सुधार जरूरी
यह विवाद छत्तीसगढ़ सरकार के लिए गंभीर चुनौती पेश करता है। ट्रस्टों की जमीन पर बोनस वितरण पर साफ प्रतिबंध होने के बावजूद भुगतान कैसे हुआ, इसकी जड़ें खंगालना जरूरी है।
गंधेश्वर मंदिर ट्रस्ट का यह कांड बताता है कि आस्था और अर्थ के संगम में भ्रष्टाचार का खतरा हमेशा लटका रहता है। अब जरूरत है कड़े कानूनों, डिजिटल रिकॉर्डिंग और नियमित ऑडिट की, ताकि धार्मिक संपत्तियां सुरक्षित रहें। सत्य की जीत अंततः होगी, और राज्य का विकास निर्बाध चलेगा।
