January 16, 2026

महासमुंद में फर्जी नाड़ी जादूगर का काला कारोबार बेनकाब करोड़ों की ठगी का अंत, क्लीनिक पर प्रशासन का हथौड़ा..!

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पूर्व में इनकी चिकित्सकीय परीक्षण से एक बच्ची की हुई थी मौत

महासमुंद / 30 अक्टूबर 2025 छत्तीसगढ़ के शांतिप्रिय शहर महासमुंद में बुधवार को एक बड़ा धमाका हुआ, जब जिला प्रशासन ने एक कुख्यात फर्जी डॉक्टर के क्लीनिक को सील कर दिया। नाड़ी परीक्षण के नाम पर वर्षों से भोले-भाले लोगों को ठगने वाले शेषनारायण गुप्ता का श्रीराम केयर क्लीनिक अब इतिहास बन चुका है। यह कार्रवाई न केवल एक व्यक्ति की ठगी का अंत है, बल्कि पूरे क्षेत्र में फैले फर्जी चिकित्सा रैकेट की चेतावनी भी है। जिला कलेक्टर विनय कुमार लगेंह के सख्त आदेश पर हुई इस छापेमारी ने शहरवासियों को राहत की सांस दी, लेकिन साथ ही सवाल भी खड़े कर दिए कि इतने सालों तक यह खेल कैसे चलता रहा..?

ठगी का साम्राज्य नाड़ी के नाम पर करोड़ों की कमाई

शेषनारायण गुप्ता, जो खुद को नाड़ी रोग विशेषज्ञ बताते थे, कुम्हारपारा इलाके में एक साधारण घर से अपना ‘सुपर क्लीनिक’ चला रहे थे। बाहर से देखने में यह कोई सामान्य दवाखाना लगता था, लेकिन अंदर की हकीकत किसी बड़े अस्पताल से कम नहीं थी। यहां हर रोज सैकड़ों मरीजों की भीड़ लगती थी, खासकर ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब और अशिक्षित लोग। गुप्ता का तरीका बड़ा शातिराना था – वे मरीजों की नाड़ी पकड़कर ‘जादुई’ निदान बताते और फिर इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूलते। प्रत्येक मरीज से 1200 से 1500 रुपये तक लिए जाते थे, और महीनों में यह रकम करोड़ों में पहुंच गई थी।
गुप्ता के पास कोई वैध मेडिकल डिग्री नहीं थी। वे न तो इंडियन मेडिकल काउंसिल से रजिस्टर्ड थे और न ही आयुर्वेदिक या किसी अन्य चिकित्सा प्रणाली के प्रमाणित विशेषज्ञ। फिर भी, वे एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और यहां तक कि इंजेक्शन वाली दवाओं का इस्तेमाल करते थे। क्लीनिक में दवाओं के ढेर लगे रहते थे – सिरिंज, टैबलेट्स, और तरह-तरह की मेडिसिन्स। मरीजों को डराया जाता कि ‘अगर इलाज नहीं कराया तो बीमारी जानलेवा हो जाएगी’। यह सब चिकित्सा अधिनियम का खुला उल्लंघन था, जो फर्जी डॉक्टरों पर सख्त पाबंदी लगाता है।

मौत का साया: एक युवती की दर्दनाक कहानी ने खोला राज

इस फर्जीवाड़े का सबसे दुखद पहलू अप्रैल 2022 में सामने आया, जब 21 वर्षीय हंशी श्रीवास्तव नामक युवती की मौत हो गई। हंशी टीबी से पीड़ित थीं और सरकारी अस्पताल ने उन्हें छह महीने की नियमित दवा की सलाह दी थी। लेकिन गुप्ता ने परिवार को बहकाया कि ‘टीबी कोई बड़ी बीमारी नहीं, मैं इसे जड़ से उखाड़ फेंकूंगा’। उनकी ओवरडोज दवाओं ने युवती की हालत बिगाड़ दी, और 30 अक्टूबर 2022 को उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया – उसके शरीर में सिर्फ छह ग्राम खून बचा था।
परिजनों की शिकायतों ने आग में घी डाला। वे न्याय की गुहार लगाते रहे, लेकिन शुरुआत में कोई सुनवाई नहीं हुई। यह घटना फर्जी डॉक्टरों की खतरनाक दुनिया की एक मिसाल है, जहां गलत इलाज से जानें चली जाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अक्सर गरीब परिवार चुप रह जाते हैं, लेकिन हंशी की मौत ने कई अन्य पीड़ितों को आवाज दी।

प्रशासन का तूफानी एक्शन: छापा और सीलिंग की पूरी कहानी

पत्रकार मयंक गुप्ता की लगातार कोशिशों से यह मामला उजागर हुआ। उन्होंने ‘बेबाक बयान’ पोर्टल पर वीडियो साक्ष्य और दस्तावेजों के साथ शिकायत की, जो सीधे कलेक्टर विनय लगेंह और मुख्य चिकित्सा अधिकारी तक पहुंची। कलेक्टर ने तुरंत जांच के आदेश दिए।
बुधवार सुबह 9 बजे टीम ने क्लीनिक पर धावा बोला। टीम में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आई. नागेश्वर, डॉ. विकास चंद्राकर, तहसीलदार जुगल किशोर पटेल, मेडिकल ऑफिसर डॉ. घनश्याम चंद्राकर और नोडल अधिकारी छत्रपाल चंद्राकर शामिल थे। मौके पर पहुंचते ही टीम स्तब्ध रह गई – क्लीनिक में मरीजों की लंबी लाइन लगी थी, एक युवती रिसेप्शन पर नाम दर्ज कर रही थी, और अंदर गुप्ता मरीजों को ‘इलाज’ दे रहे थे।
जांच में गुप्ता कोई वैध दस्तावेज नहीं दिखा सके। टीम ने दवाओं, सिरिंजों, बायोमेडिकल वेस्ट और मरीजों के रिकॉर्ड्स को जब्त कर लिया। क्लीनिक में अवैध लैब जैसी सुविधाएं भी मिलीं, जहां टेस्ट किए जाते थे। आखिरकार, कलेक्टर के आदेश पर क्लीनिक को सील कर दिया गया। यह कार्रवाई फर्जी चिकित्सा के खिलाफ एक मिसाल बनेगी, जो पूरे प्रदेश में फैले ऐसे रैकेट्स को चेतावनी देती है।

शहरवासियों की मिली-जुली प्रतिक्रिया गुस्सा और उम्मीद

कार्रवाई के बाद शहर में हलचल मच गई। स्थानीय निवासी संजय वर्मा ने कहा, “हमारे मोहल्ले में रोज सैकड़ों लोग आते थे, हमें लगा कोई बड़ा डॉक्टर है। लेकिन अब पता चला कि यह सब धोखा था। प्रशासन को धन्यवाद।” महिला वकील अदिति दुबे ने जोर दिया, “ऐसे फर्जी डॉक्टर गरीबों की जिंदगी से खेलते हैं। इनके खिलाफ मौत की सजा जैसी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि कोई और न डराए।”
पत्रकार मयंक गुप्ता ने अपनी जांच का जिक्र करते हुए कहा, “कई हफ्तों की मेहनत से यह संभव हुआ। मीडिया और प्रशासन की साझेदारी से ही ऐसे फर्जीवाड़े रुक सकते हैं।” वहीं, कलेक्टर विनय लगेंह ने साफ चेतावनी दी: “जिले में किसी भी फर्जी क्लीनिक या डॉक्टर को बख्शा नहीं जाएगा। सभी को वैध लाइसेंस और योग्यता साबित करनी होगी, वरना सख्त एक्शन होगा।”

बड़ा सबक जागरूकता है असली दवा

यह घटना पूरे छत्तीसगढ़ और देश के लिए एक बड़ा सबक है। नाड़ी परीक्षण या पारंपरिक चिकित्सा के नाम पर ठगी के कई मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन महासमुंद का केस सबसे चर्चित बन गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी डॉक्टर के पास जाने से पहले उसकी डिग्री, रजिस्ट्रेशन और रिव्यू जांचें। सरकारी अस्पतालों को प्राथमिकता दें, जहां मुफ्त और विश्वसनीय इलाज मिलता है।
अब कुम्हारपारा का वह क्लीनिक, जो कभी विश्वास की दुकान था, कानून के कठघरे में है। यह कार्रवाई साबित करती है कि सतर्क नागरिक, जागरूक मीडिया और सक्रिय प्रशासन मिलकर किसी भी काले कारोबार को नेस्तनाबूद कर सकते हैं। महासमुंद के लोग अब सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, लेकिन सवाल बाकी है – कितने और फर्जी डॉक्टर अभी भी अंधेरे में खेल रहे हैं..?

पत्रकार मयंक गुप्ता

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